अनवर मिर्ज़ापुरी

मैं नज़र से पी रहा हूँ ये समाँ बदल जाए

झुकाओ तुम निगाहें कहीं रात ढल जाए

 

मिरे अश्क भी हैं इस में ये शराब उबल जाए

मिरा जाम छूने वाले तिरा हाथ जल जाए

अभी रात कुछ है बाक़ी उठा नक़ाब साक़ी

तिरा रिंद गिरते गिरते कहीं फिर सँभल जाए

मिरी ज़िंदगी के मालिक मिरे दिल पे हाथ रखना

तिरे आने की ख़ुशी में मिरा दम निकल जाए

मुझे फूँकने से पहले मिरा दिल निकाल लेना

ये किसी की है अमानत मिरे साथ जल जाए

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