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Showing posts from August, 2017

शकील बदायुनी

ऐ मोहब्बत तिरे अंजाम पे रोना आया जाने क्यूँ आज तिरे नाम पे रोना आया यूँ तो हर शाम उमीदों में गुज़र जाती है आज कुछ बात है जो शाम पे रोना आया कभी तक़दीर का मातम कभी दुनिया का गिला मंज़िल-ए-इश्क़ में हर गाम पे रोना आया मुझ पे ही ख़त्म हुआ सिलसिला-ए-नौहागरी इस क़दर गर्दिश-ए-अय्याम पे रोना आया जब हुआ ज़िक्र ज़माने में मोहब्बत का 'शकील' मुझ को अपने दिल-ए-नाकाम पे रोना आया

अनवर मिर्ज़ापुरी

मैं नज़र से पी रहा हूँ ये समाँ बदल न जाए न झुकाओ तुम निगाहें कहीं रात ढल न जाए   मिरे अश्क भी हैं इस में ये शराब उबल न जाए मिरा जाम छूने वाले तिरा हाथ जल न जाए अभी रात कुछ है बाक़ी न उठा नक़ाब साक़ी तिरा रिंद गिरते गिरते कहीं फिर सँभल न जाए मिरी ज़िंदगी के मालिक मिरे दिल पे हाथ रखना तिरे आने की ख़ुशी में मिरा दम निकल न जाए मुझे फूँकने से पहले मिरा दिल निकाल लेना ये किसी की है अमानत मिरे साथ जल न जाए

मुनीर नियाज़ी

बेचैन बहुत फिरना घबराए हुए रहना, इक आग सी जज़्बों की दहकाए हुए रहना | छलकाए हुए चलना ख़ुशबू लब-ए-लालीं की, इक बाग़ सा साथ अपने महकाए हुए रहना | उस हुस्न का शेवा है जब इश्क़ नज़र  आये , पर्दे में चले जाना शरमाए हुए रहना | इक शाम सी कर रखना काजल के करिश्मे से, इक चाँद सा आँखों में चमकाए हुए रहना | आदत ही बना ली है तुम ने तो 'मुनीर' अपनी, जिस शहर में भी रहना उकताए हुए रहना |